मै बंगलुरु से हूँ। मेरा नाम जगदीश सुनकर लोग सोचते हैं कि
अभी तक 19 इनोवेटिव डिवाइस बना चुके है |
पैशन और प्रॉफ़ेशन पर एक टेड टॉक भी दी है |
कोई सीनियर डॉक्टर होंगे, लेकिन वे पाते हैं कि मैं यंग हूं। इस पर भी मैं जोक्स करता हूं। बचपन से ही मुझे थिएटर का शौक रहा है। स्कूल के दिनों से ही कई सारे प्ले किए। तब इंडिया में स्टैंडअप कॉमेडी इतनी प्रचलित नहीं थी। लॉफ्टर चैलेंज के बाद यह चीज लोकप्रिय हुई। इमर्जेंसी या नाइट ड्यूटी के कारण कई बार प्ले की रिहर्सल नहीं हो पाती थी तो मैंने माइम्स, मोनोलॉग्स जैसे दूसरे फॉर्मट ट्राय किए। स्टैंडअप कॉमेडी मेरे क्लिनिकल शेड्यूल में फिट हो रहा था, तो यही करने लगा। मैं अभी तक पांच सौ से ज्यादा कॉमेडी शो कर चुका हूं।
वास्तव में पेशेंट से कनेक्ट करने में हमर वहत मदद करता है। जब मैंने कॉमेडी शुरू की थी तो मेरे दोस्तों ने कहा, क्या अव तुम्हें डॉक्टर के रूप में सीरियसली लिया जाएगा? एक ने तो यह भी कहा कि जोकर के पास पेशेंट कैसे आएंगे? लेकिन जब कॉमेडी में पॉपुलैरिटी बढ़ी तो पेशेंट्स और ज्यादा आने लगे। बहुत पेशेंट्स ने बताया कि वो मेरे साथ सहज अनुभव करते हैं और मुझ पर भरोसा कर पाते हैं। सच मानिए, ह्यूमर एक भरोसा बनाने वाला इमोशन है।
मेडिकल जुगाड़ का काम ऐसे शुरू हुआ कि जब मैं पेशेंट्स को देखता था तो मुझे कुछ कमी महसूस होती थी। ग्रामीण इलाकों में ईएनटी की प्रेक्टिस में समस्याएं आती थीं। खासकर गला देखने में, क्योंकि हम पुराने तरह के मिरर्स अव भी इस्तेमाल करते हैं। इसलिए मैंने सोचा कि डिजिटल कैमरा से कनेक्ट करके एंडोस्कोपी वनाई जाए। बाद में एक औपचारिक ट्रेनिंग भी ली और कई प्रॉडक्ट्स बनाए। अभी जो सबसे नई डिवाइस बनाई है, उसमें हम वर्चुअल तरीके से भी लोगों का कान, नाक, गला देख सकते हैं। यह वायरलेस डिवाइस है, जिसको पेशेंट खुद इस्तेमाल कर सकता है। इसे हम हाई टेली एग्जामिनेशन डिवाइस कहते हैं। मैं अभी तक 19 इनोवेटिव डिवाइसेस बना चुका हूं।
शुरू में लोग कहते थे कि डॉक्टर हो, सर्जन हो तो यह सब क्यों कर रहे हो। लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि आप खुद को किस तरह देखते हैं। क्या आप खुद को ओपीडी में पेशेंट देखने वाले डॉक्टर की तरह देखते हैं या मरीजों की मदद के लिए किसी नई डिवाइस का आविष्कार करने की तैयारी रखते हैं। टेक्नोलॉजी बनाना हमारा डोमेन नहीं, लेकिन इनोवेशन के लिए मल्टीपल डोमेन में ही काम होता है।
बीते दस सालों को देखें तो सरकार की तरफ से बहुत प्रो-एक्टिव सपोर्ट मिल रहा है। वहत रिस्क-फ्री ग्रांट और फंड उपलब्ध हैं। अगर
आपके पास जेनुइन आइडिया है तो उसको नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के लिए सरकार पैसा देती है। यह इको-सिस्टम पहले नहीं था।

Comments
Post a Comment