रूमा छोटे से गांव से निकली फैशन डिजाइनर, हार्वर्ड यनिवर्सिटी में जाकर लेक्चर तक दिया
मैं चाहती हूं कि आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए रिवर्स माइग्रेशन हो, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के लोग सुविधाओं के लिए शहरों की ओर न जाएं, सभी सुविधाएं गांवों में ही उपलब्ध हो, यही हमारा मिशन है। इसके लिए स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं गांवों में ही जुटाने के प्रयास कर रहे हैं। ऐसे कदम शहरीकरण को रोकने में सहायक होंगे, साथ ही गांवों के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। आज की युवा पीढ़ी बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रह-रहकर ऊब चुकी है, वो भी गांव की ओर jqख कर वापस अपनी जड़ों, संस्कृति, आर्ट और क्राफ्ट से रोजगार पा सकेगी। इसी के तहत देशभर से युवा इंटर्नशिप करने के लिए भी हमारे पास आ रहे हैं। यूथ गांवों में बसी ढाणियों में रहकर दस्तकार महिलाओं के साथ काम करते हैं, जिससे नई पीढ़ी-पुरानी पीढ़ी से हुनर तो सीख ही रही है, नए आइडियाज साझा कर इनोवेशंस कर रोजगार अधिक अवसर पैदा हो रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में गांवों क पिछड़े छात्र-छात्राओं को स्कॉलरशिप देने के लिए अक्षरा छात्रवृत्ति योजना शुरू की है। रूमा बताती हैं, मैंने 10 महिलाओं के समूह व 1 सैकंड हैंड सिलाई मशीन से परंपरागत कशीदाकारी बैग बनाना शुरू किया, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा, आज मेरे साथ 30 हजार से अधिक महिलाएं जुड़ हुई हैं।
ठान लिया, अब तो जीतकर रहेंगे
जब सभी आर्टिजन संगठित हो गए, प्रोडक्शन की क्षमता बहुत बढ़ गई तो हमने एग्जीबिशन में जाना शुरू किया। पर आर्टिजन को लोग मजदूर की तरह ही देख रहे थे, उनको डिजाइनर का हक नहीं मिल रहा था। तब मैंने सोचा कि अब हम आर्टिजन सिर्फ आर्टिजन नहीं है। यह हमारे सम्मान की लड़ाई थी, इसके लिए बाजार में डिजाइनर के रूप में अपनी पहचान कायम करना चाहते थे। उस समय मुझे बहुत निराशा महसूस हो रही थी, जब कोई हेल्प करने के लिए तैयार नहीं था। बड़े-बड़े डिजाइनरों ने हाथ खींच लिए थे। जो एनजीओ सपोर्ट कर रहे थे, वह कहने लगे कि आप आर्टिजन हो, अपनी सीमा में रहो। तब मैंने ठान लिया कि ये लड़ाई भी खुद के दम पर ही लड़नी होगी। मशक्कत के बाद हमें फैशन शो करने का मौका मिला और हमने अपनी पहचान का आगाज किया। हाल ही दिल्ली हाट में जब मेरे साथ देशभर की आदिवासी बहनें रैंप पर चलीं तो लगा पहचान की लड़ाई अब मूर्त रूप ले रही है। प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग तक आज आर्टिजन खुद सारे काम कर रहे हैं।
उड़ान की कहानी
कभी नहीं सोचा कि आठवीं पास ग्रामीण महिला हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में लेक्चर देगी, लोग गंभीरता से सुनेंगे और विचारों की कद्र करेंगे। आर्टिजन ही डिजाइनर है और यह लड़ाई एक दिन मुझे डिजाइनर ऑफ द ईयर के खिताब तक पंहुचा देगी, लेकिन जब हजारों नारी साथ हों तो संभव हो सकता है। मात्र सुई धागे से घर में शुरू किए काम से राष्ट्रपति से सम्मान ग्रहण करने से लेकर केबीसी व इंडियन आइडल जैसे प्लेटफार्म पर आमंत्रित होना देश की हर बहन के लिए आगे बढ़ने व पहचान कायम करने की प्रेरणा दे रहा है।
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